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پدر
آن تیشه که بر خاک تو زد دست اجل |
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تیشه ای بود که شد بـــــــــاعث ویرانی من |
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یوسفت نــــــــام نـــهادند و به گرگت دادند |
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مرگ
، گرگ تو شد ای یوسف کنعانی من |
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مـــــــــه گردون ادب بودی در خاک شدی |
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خــــــاک زندان تو گشت ای مه زندانی من |
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از
نــــــدانستن مــــــــــن دزد قضا آگه بود |
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چــــــون تـــــــورا برد بخندید به نادانی من |
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آن
کــه در زیـــر زمین داد سر و سامانت |
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کـــاش می خورد غم بی سر و سامانی من |
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به
ســر خاک تو رفتم ، خط پاکش خواندم |
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آه
از این خـــــــط که نوشتند به پیشانی من |
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رفتی و روز مــرا تیره تر از شب کردی |
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بی
تو در ظلمتم ای دیــــــــــــده نورانی من |
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بی
تو اشک وغم وحسرت همه مهمانمنند |
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قـــــــــدمی رنجه کن از مهر به مهمانی من |
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صفـــــــحه روی ز انظار نــهان می دارم |
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تــــــا نخوانند بر ایـــن صفحه پریشانی من |
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دهر
بسیار چومن سربه گریبان دیده است |
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چـــــــــه تفاوت کندش ســـر به گریبانی من |
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عضو
جمعیت حق گشتی و دیگر نخوری |
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غــــــــم تنهایی و مهجوری و حـــیرانی من |
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گل
ریــــــــــــــحان کدامین چـمنت بنمودند |
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کــــــه شکستی قفس ، ای مرغ گلستانی من |
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مــــــن کـه قـدر گوهـر پاک تو می دانستم |
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زچــــــــــه مفقود شدی ای گــوهر کانی من |
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مــــــن کـه آب تو زسرچشمه دل مـی دادم |
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آب
و رنگت چــــه شد ، ای لاله نعمانی من |
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من
یکی مرغ غزل خوان تو بودم چه فتاد |
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کــــه دگــــر گوش نــداری به نواخوانی من |
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گنج
خــــــــود خواندیم و رفتی و بگذاشتیم |
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ای
عـــــــــجب بعد تو با کیست نگهبانی من |
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اینکه خاک سیهش بــــــالین است |
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اخــــــتر چرخ ادب پــــروین است |
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گـــــــرچه جز تلخی از ایـــام ندید |
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هرچه خواهی سخنش شیرین است |
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صـــــاحب آن هــمه گفتار امروز |
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ســــــائل فـــــاتحه و یـــاسین است |
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دوســــــــتان به که ز وی یاد کنند |
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دل
بــــی دوست دلـی غمگین است |
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خاک
در دیده بسی جان فرساست |
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سنگ
بــر سینه بسی سنگین است |
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بیند ایــــــــن بستر و عبرت گیرد |
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هــرکــه را چشم حــقیقت بین است |
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هـــرکــه باشی و ز هر جا برسی |
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آخــــرین منزل هــستی ایـــن است |
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آدمــــــــی هــــرچــه توانگر باشد |
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چون
بدین نقطه رسد مسکین است |
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انــــــــدر آنجا کـــه قضا حمله کند |
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چــــــاره تسلیم و ادب تمکین است |
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زادن و کِشتن و پنهان کــــــــردن |
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دهــر را رســـم و ره دیـرین است |
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خرم
آن کس که در این محنت گاه |
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خـــــــاطری را سـبب تسکین است |
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